चंद्रबदनी, टिहरी गढ़वाल, 07 अक्टूबर 2026।श्री देव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय परिसर, चंद्रबदनी में गढ़भोज दिवस के अवसर पर गढ़वाली एवं कुमाऊँनी पारंपरिक व्यंजनों की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को उत्तराखंड के पारंपरिक खान-पान, स्थानीय खाद्य पदार्थों के पोषण एवं स्वास्थ्य लाभ तथा प्रदेश की समृद्ध लोक-संस्कृति से परिचित कराना रहा।कार्यक्रम में छात्राओं ने उत्तराखंड के पारंपरिक परिधान धारण कर प्रदेश की लोक-संस्कृति और परंपराओं की मनमोहक झलक प्रस्तुत की। इसके साथ ही छात्राओं ने विभिन्न पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन तैयार कर उनकी प्रदर्शनी लगाई। उन्होंने व्यंजनों में प्रयुक्त सामग्री, उनमें पाए जाने वाले पोषक तत्वों तथा उनके स्वास्थ्य लाभों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी।प्रदर्शनी में मंडुवा, झंगोरा, भट्ट, गहत, राजमा, तिल सहित उत्तराखंड में प्रचलित विभिन्न स्थानीय अनाज, दालों और खाद्य पदार्थों से तैयार पारंपरिक व्यंजन प्रदर्शित किए गए। छात्राओं ने बताया कि पहाड़ी भोजन केवल स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि पोषण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। स्थानीय अनाज, दालें, मोटे अनाज और मौसमी सब्जियां संतुलित एवं पौष्टिक आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।इस अवसर पर प्राचार्य मेहंत मौर्य ने कहा कि गढ़भोज दिवस हमारी पारंपरिक खाद्य संस्कृति को समझने और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के स्थानीय अनाज एवं पारंपरिक व्यंजनों को बढ़ावा देकर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ स्वस्थ खान-पान को भी प्रोत्साहित कर सकते हैं।डॉ. दीक्षित ने गढ़भोज के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उत्तराखंड की पारंपरिक थाली यहां की भौगोलिक परिस्थितियों, जीवनशैली और लोक परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने विद्यार्थियों से स्थानीय खाद्य पदार्थों के उपयोग और संरक्षण के प्रति जागरूक रहने का आह्वान किया।डॉ. थपलियाल ने कहा कि उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजन हमारी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक खान-पान के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक खाद्य पदार्थों और व्यंजनों को संरक्षित करना तथा युवा पीढ़ी को उनसे जोड़ना आवश्यक है।कार्यक्रम का आयोजन डॉ. पूजा, प्रभारी, गृह विज्ञान विभाग के मार्गदर्शन में किया गया। छात्राओं सुमन, दिव्या, निकिता, निशा, सोनम, अंशिका, गीतांजलि एवं समीक्षा ने सक्रिय सहभागिता करते हुए पारंपरिक परिधान धारण किए तथा विभिन्न पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों को तैयार कर प्रदर्शित किया।कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि “हमारी पारंपरिक थाली में स्वाद भी है, पोषण भी है और हमारी संस्कृति भी।” गढ़भोज दिवस के आयोजन ने उत्तराखंड की समृद्ध खाद्य एवं सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने के साथ-साथ विद्यार्थियों को अपनी जड़ों, स्थानीय खाद्य परंपराओं और लोक-संस्कृति से जोड़ने का सार्थक प्रयास कियाकार्यक्रम में परिसर के सभी प्राध्यापक, कर्मचारी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। सभी ने छात्राओं द्वारा प्रस्तुत पारंपरिक परिधान एवं व्यंजनों का अवलोकन किया तथा उत्तराखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति के संरक्षण के महत्व पर चर्चा की।




